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संपादकीय धरती पुत्र किसान के संघर्ष में साथ लगने के मायने           गत वर्ष की प्रथम तिमाही के अंत से चली आ रही महामारी और लॉकडॉन ने, न सिर्फ सामाजिक ताना-बाना ध्वस्त करके रख दिया है, बल्कि इससे सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों पर भी गहरा असर पड़ा है। विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ साथ साहित्यिक गतिविधियों तक पर अघोषित अंकुश लगकर रह गया। अनेक पत्र पत्रिकाएं स्थगित हो गईं । कइयों को अपने अंक प्रिंट के बजाए ऑनलाइन प्रचारित व प्रसारित करने पड़े। दलित लेखक संघ की यह पत्रिका भी इससे अछूती नहीं रही। गत दो-तीन अंकों से इसे भी ऑनलाइन ही प्रसारित करने की विवशता पेश आ रही है। इस बार तो दो त्रैमासिक !जनवरी - मार्च एवं अप्रैल - जून, 2021) अंकों की चयनित सामग्री को जोड़कर यह संयुक्ताक बनाना पडा। इसके पीछे, रोजगार श्रृंखला,आवजाही और आपसी संपर्कों के क्रम का टूट जाना ही बड़ा कारण है। अभी भी हालात सामान्य नहीं, लिहाजा यह अंक भी ऑनलाइन ही तैयार किया गया है। निकट भविष्य में, सबकुछ सामान्य हुआ तो इसे प्रिंट करने का प्रयास रहेगा। यद्यपि दिनोंदिन बढ़ती मंहगाई में प्रिंट का का...

खेल जो हमने खेले की भूमिका, यादों का मेला, डॉ. शुकदेव श्रोत्रिय

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  खेल जो हमने खेले की भूमिका                                   यादों का मेला - डॉ. शुकदेव श्रोत्रिय अमित धर्मसिंह की पुस्तक ‘खेल जो हमने खेले’ यादों के मेले जैसी है। इससे पहले उनकी पुस्तक ‘रचनाधर्मिता के विविध आयाम’ में अधिकांश लेख पुस्तकों की समीक्षा के हैं। समीक्षा लिखते समय लेखक की दृष्टि उसी पुस्तक तक सीमित नहीं रही है, अपितु अमित धर्मसिंह ने उस पुस्तक की विधा पर विस्तृत आत्ममंथन लिखा है। इसमें लेखक की विशद एवं सूक्ष्म दृष्टि तथा ज्ञान दिखाई देता है। प्रस्तुत पुस्तक में बचपन के खेले गये खेलों का विस्तृत विवरण है। ये खेल ग्रामीण एवं कस्बई वातावरण के हैं, जहाँ क्रिकेट, बैडमिंटन जैसे आधुनिक खेल नहीं खेले जाते। मेरा अपना बचपन जिस मौहल्ले में बीता था, वह कहने को तो मुरादाबाद शहर का एक मौहल्ला था, किन्तु वहाँ का वातावरण ठेठ कस्बई था। बिजली थी नहीं, सड़कें तथा बीच का मैदान कच्चा, धूल भरा था। यहीं मैंने कबड्डी, गिल्ली-डंडा तथा लट्टू नचाने जैसे खेल खेले थे। किन्तु बहुतों को भूल भी चुका हूँ। अमित धर्मसिं...
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संपादकीय                   कोरोना काल में दलित कविता                                       -डा. अमित धर्मसिंह        समय बदलता है तो आदमी के सोचने का तरीका बदल जाता है; साधन-संसाधन बदलते हैं, तब भी आदमी के सोचने-समझने का तरीका बदल जाता है। सवाल यह है कि समय बदलता है या उसे बदला जाता है? कुछेक प्राकृतिक आपदाओं को छोड़ दें तो बाकी मामलों में समय बदलता नहीं उसे बदला जाता है। इसके पीछे बहुत से राजनीतिक कारण होते हैं। आमजन के जीवन में जितने भी सामाजिक और आर्थिक बदलाव आते हैं, उन सबके पीछे अधिकतर राजनीति ही जिम्मेदार होती है। भले ही वह प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हो या अप्रत्यक्ष रूप से। स्थानीय स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक की राजनीति का विकृत रूप आमजन के जीवन को ही त्रस्त करता है। इसके अलावा अकाल, सूखा, बाढ़, भ्रष्टाचार, अपराध की गाज भी आमजन की खुशियों पर ही गिरती है। महामारी की चपेट में तो गरीब लोग और बुरी तरह फंसते हैं। कह...

साहित्य अनुशीलन मंच के फेसबुक ग्रुप पर रचनात्मक सहभागिता की नियमावली : ग्रुप एडमिन, दिनांक 20/07/2020

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साहित्य अनुशीलन मंच (SAM), साहित्य का लोकतांत्रिक ग्रुप है, इस पर रचनात्मक गतिविधियां करने हेतु सामान्य और विशेष नियम इस प्रकार हैं - सामान्य नियम :- 1) ग्रुप का प्रत्येक सदस्य अपनी कोई भी प्रकाशित, अप्रकाशित रचना (कविता, गीत, ग़ज़ल, दोहे, छंद, कहानी, नाटक, लेख, संस्मरण, आत्मकथा, जीवनी, रिपोर्ट, पत्र आदि) जब चाहे, तब ग्रुप पर पोस्ट कर सकता है। किन्तु, प्रत्येक सदस्य एक दिन में एक या दो ही पोस्ट लगा सकता है। स्तर का विशेष ध्यान रखना होगा। स्तरहीन रचना को एडमिन approve न करने के लिये स्वतंत्र है। 2) ग्रुप का प्रत्येक सदस्य सेल्फी, गुड मॉर्निंग, गुड इवनिंग आदि संदेश, जन्मदिन संबंधी फोटो, पोस्टर या पोस्ट, गैर साहित्यिक संदर्भ में बधाई, शुभकामना संदेश और व्यक्तिगत या पारिवारिक गतिविधियों की सूचना और फोटोग्राफ्स आदि छोड़कर केवल अपने या दूसरों के साहित्यिक कार्यक्रमों की रिपोर्ट्स और फोटोग्राफ्स आदि ही पोस्ट कर सकता है। 3) ग्रुप का प्रत्येक सदस्य ग्रुप पर व्यक्तिगत लाइव काव्य पाठ आदि छोड़कर, अति आवश्यक ऑडियो, वीडियो अथवा डॉक्यूमेंट्री ही अपलोड कर सकता है। 4) ग्रुप का कोई भी सदस...

साहित्य अनुशीलन मंच का फेसबुक ग्रुप: क्रिएट बाई ग्रुप एडमिन, दिनांक 20/07/2020

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दिनांक 19/07/2020 दिन रविवार को कमल त्यागी द्वारा साहित्य अनुशीलन मंच का फेसबुक ग्रुप क्रिएट किया गया... ग्रुप एडमिन : कमल त्यागी अमित धर्मसिंह परमेंद्र सिंह ग्रुप का लिंक : https://www.facebook.com/groups/324360395407638/?ref=share

विटामिन ज़िन्दगी पर साहित्य अनुशीलन मंच की परिचर्चा गोष्ठी, दिनांक 27/12/2019

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विटामिन ज़िन्दगी पर साहित्य अनुशीलन मंच की परिचर्चा गोष्ठी मुजफ्फरनगर। साहित्य अनुशीलन मंच (SAM) की परिचर्चा गोष्ठी आर्य समाज रोड स्थित डीएवी कॉलेज में संपन्न हुई। परिचर्चा रोल मॉडल ललित कुमार की बहुचर्चित पुस्तक ' विटामिन ज़िन्दगी ' पर आधारित रही।यह पुस्तक विकलांग विमर्श का साहित्यिक पदार्पण सरीखी है। यद्यपि यह पुस्तक ललित कुमार के आत्मसंघर्ष को सामने लाती है किन्तु इसके माध्यम से विकलांग जनों की सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक और मानसिक त्रासदी सशक्त रूप में उभरकर सामने आती है। संभवतःसाहित्य में यह पहली ऐसी पुस्तक है जो शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के सामाजिक अधिकारों और आत्मसम्मान की पैरवी करती दिखाई देती है। परिचर्चा के आरंभ में         अश्वनी खंडेलवाल ने कहा कि "विटामिन ज़िन्दगी सरल भाषा में असीमित जिजीविषा की उत्कृष्ट प्रस्तुति है। अभिधा में लिखी गई यह पुस्तक एक पठनीय पुस्तक है। समाज में इस पुस्तक का पढ़ा जाना अनिवार्य है। खासतौर से उन तथाकथित अध्यापकों को यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए जो विकलांग छात्रों को अक्षम अथवा दूसरों से कमजोर समझते हैं। पुस्तक में कई ऐसी...

हमारे गांव में हमारा क्या है! पर साहित्य अनुशीलन मंच की परिचर्चा गोष्ठी, दिनांक 06/10/2019

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साहित्य अनुशीलन की "हमारे गांव में हमारा क्या है!" पर परिचर्चा मुजफ्फरनगर। साहित्य अनुशीलन मंच (SAM) की प्रथम पुस्तक परिचर्चा गोष्ठी अमित धर्मसिंह के चर्चित काव्य संग्रह "हमारे गांव में हमारा क्या है!" पर कमल क्लासेस, प्रकाश चौक पर संपन्न हुई। गोष्ठी में जनपद के वरिष्ठ साहित्यकारों ने संग्रह की बड़ी सारगर्भित समीक्षाएं प्रस्तुत कीं।           नेमपाल प्रजापति ने कहा कि " वे सारी संवेदनाएं, अनुभूतियां और भाव जो कवि ने इस पुस्तक में उकेरें हैं वे सब उसी के गांव के वातावरण, रहन - सहन, स्थिति और परिस्थितियों की ही देन हैं।  खेत, ट्यूबवेल, लाला की दुकान, फैक्ट्री, चक, तापड़, बाग, धर्मशाला, मंदिर आदि आदि पर कवि का भौतिक अधिकार नहीं है लेकिन भावनात्मक, संवेदनात्मक और व्यवहारिक रूप से कवि का इनसे गहरा जुड़ाव है। तभी इतने गहरे से भावों और संवेदना से सनी ये कविताएं कवि के हृदय से प्रस्फुटित हुईं हैं।" डॉ बी. एस. त्यागी ने कहा " प्रस्तुत गद्यात्मक कविताएं कवि के कुछ संस्मरण हैं। इनमें निजी अनुभव हैं इसलिए पठनीयता गजब की है। इसके शब्द जो पश्चिमी उत्तर प्रदे...