डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह बग़ैर मक़्ता के साथ माता कुसुम देवी पिता धर्मसिंह और अन्य परिवार के सभी सदस्यगण

 

ग़ज़ल से पहला राब्ता, वास्ता और रास्ता

         बचपन में मन सर्वप्रथम फिल्मी गीतों की तरफ आकर्षित होना शुरू हुआ था। यह आकर्षण, बड़ा होकर गाना लिखने वाला बनने की प्रबल इच्छा जागृत करता था। यह इच्छा, इतनी प्रबल थी कि कक्षा पांच तक आते-आते किसी-किसी गाने की नकल (पैरोडी) अथवा तुकबंदी जैसी पंक्तियां लिखने की कोशिश की जाने लगी थी। इस तरह, उन्नीस सौ पिचानवे में ही लिखने का उपक्रम शुरू हो गया था। आरम्भ में लिखने का कार्य होमवर्क की कॉपी में शुरू हुआ और बाद में दस रुपए वाले मोटे रफ रजिस्टर में। सन् उन्नीस सौ पिचानवे से निन्यानवे तक लिखने का उपक्रम बहुत धीमा रहा। यह किसी अवसर विशेष पर ही होता था। नया साल, रविदास जयंती, होली, दीवाली, शिवरात्रि, अम्बेडकर जयंती, चुनाव या कोई घटना विशेष जैसे अवसर पर ही कलम चल पाती थी। इससे अधिक सोचने व समझने की सामर्थ्य भी नहीं थी। अखबारों का कुछ रस्ता लगा तो रचनाएं, छपने के लिए भेजी जाने लगी। कभी-कभी कोई रचना छप जाती। बहुत खुशी मिलती और लिखने का उत्साह बढ़ जाता। इस तरह लिखने का सिलसिला चलता रहा। किशोर अवस्था, यानी सन् दो हजार तक आते-आते फिल्मी स्टाइल के स्वतंत्र गीत भी लिखने के प्रयास किए जाने लगे। सबसे पहला गीत या पूरा गाना आठ अक्टूबर, सन् दो हजार में बना। जिसका स्थाई या मुखड़ा, 'मैं अपने सारे सपने पूरे कर लूंगा/नैनों में सारी खुशियाँ मैं भर लूंगा।' था। इसके बाद, तत्कालीन सोच और क्षमता के अनुसार लगातार गाने लिखे जाने लगे। गानों के विषय और प्रकार में कई रंग भरने की कोशिश की गई। विरह और मिलन के एकल और युगल गानों में बदनामी, नाकामी, जुदाई, रुसवाई, जगहंसाई, बेवफ़ाई, मेहंदी, सावन के झूले, बेटी की विदाई, वक़्त आदि विषय पर अलग-अलग पैटर्न से गाने लिखे गये। सन् दो हजार से दो हजार तीन तक, संयोग और वियोग शृंगार के (एकल, युगल, मेल, फीमेल) सैकड़ों गाने लिखे गये। कुछ भजन और इक्का दुक्का देशभक्ति गाने भी लिखे गये। सभी, उस समय की विभिन्न डायरियों में आज भी ज्यों के त्यों लिखे हुए सुरक्षित हैं। 
          डायरी का जिक्र आया है तो मुझे याद आ रहा है कि सर्वप्रथम, 28 जनवरी सन् दो हजार को, पक्के गत्ते वाली दो डायरियां, दो बॉल पैन के साथ मुझे, मेरी एक मुँहबोली बहन गुलशन ज़ैदी ने भेंटस्वरूप दी थीं। वह मेरे लिखने से वाक़िफ़ थीं। वह गाँव के एक जूनियर हाई स्कूल (जो कि कक्षा एक से कक्षा आठ तक था) में मुझसे एक कक्षा आगे पढ़ती थी। दोनों पैरों से अशक्त थी। बैठकर चलती थी। पढ़ने में बहुत होशियार, खुशमिजाज़ और तहज़ीबदार थी। मुझे अपना भाई मानती थी। मानती थीं क्या, मानती हैं। भले ही बहुत दिनों से अब उससे संपर्क न हो, मगर वो ही भावना, वो ही सम्मान, गुलशन बहन के लिए आज भी मन में है। बहरहाल, रफ रजिस्टर से पुरानी रचनाएँ, पहली बार उसी की दी हुई पक्के गत्ते वाली डायरियों में उतारी गई थीं। जब यह ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित करने का विचार किया गया तो सबसे पहले यही पुरानी डायरी खंगालने की कवायद शुरू हुई। इन्हीं डायरियों में सन् दो हजार एक की एक ग़ज़लनुमा रचना 'ज़िन्दगी प्यास जैसी है/निराशा में आस जैसी है।' मिली। छह सात शेरों की यह रचना आंशिक संशोधन के साथ इस ग़ज़ल संग्रह में बतौर पहली ग़ज़ल शामिल की गई है। इसके उपरांत दो हजार दो में एक साथ और एक ही तारीख में लिखी हुईं दो रचनाएँ मिली, जिन्हें उस वक़्त गीत या गाने की शक़्ल में लिखा गया था लेकिन थीं वे ग़ज़ल के निकट। ये दोनों ग़ज़ल 'हर घर घड़ी दिल ये बेक़रार रहता है। जाने क्यूँ उनका इंतज़ार रहता है।' और 'सोचता हूँ इक तरफ़ा प्यार, प्यार रहता है। जाने क्यूँ उनका इंतज़ार रहता है।' हैं। आंशिक संशोधन के बाद इन्हें भी पहली ग़ज़लों के तौर पर संग्रह में शामिल किया गया है। यद्यपि ये उस समय की ग़ज़लें हैं जब मैं ग़ज़ल के महज नाम भर से वाक़िफ रहा हूँगा। ग़ज़ल की बहर, वज़्म की तो बात दूर, लिखने व सोचने तक के ख़्याल से दूर था। न जाने कैसे ये तीन रचनाएँ गानों के बीच में आ फंसी जो गीत या गाने के नहीं बल्कि ग़ज़ल के अधिक निकट थीं। हो सकता है यह कुछ ग़ज़लों को सुनने का प्रभाव हो। मगर इतना जरूर है कि ये तीनों ही रचनाएँ ग़ज़ल सोचकर तो बिल्कुल नहीं लिखी गई थीं। 
           दो हजार दो में आर्थिक तंगी के कारण बारहवीं की पढ़ाई छूट गई तो स्वतंत्र अध्ययन और लेखन में अधिक समय बीतने लगा। खासकर, गाने आदि लिखने का श्रम चलता रहा। जीविका के लिए मुजफ्फरनगर की भरतीया कॉलोनी में एक छोटा-सा क्लीनिक खोल लिया। क्लीनिक के सामने एक पीसीओ थी जिस पर प्रमोद कुमार बैठते थे। धीरे धीरे उनसे मित्रता हो गई। कुछ समय पीसीओ पर भी बीतने लगा। पीसीओ पर अमर उजाला आया करता था। इस बहाने पीसीओ का एक चक्कर तो सुबह ही लग जाया करता था। सन् दो हजार तीन में, जनवरी या फरवरी की कोई तारीख रही होगी (अब ठीक से याद नहीं) के अमर उजाला में क्लासीफाइड वाले पेज पर एक विज्ञापन देखने को मिला। विज्ञापन में ग़ज़ल एलबम के लिए ग़ज़ल लेखक, सिंगर्स, मॉडल म्यूजिशियन आदि को आमंत्रित किया गया था। मिलने का स्थान 'सिद्ध कॉम्प्लेक्स, गऊशाला रोड, नयी मंडी, मुजफ्फरनगर' था। मिलने का समय वर्किंग डे में शाम चार या पांच बजे का था। पढ़कर अच्छा लगा कि यह तो अपने ही शहर की बात है इसलिए कुछ डायरी लेकर, उसी शाम मिलने पहुंच गया। हालांकि ग़ज़ल लिखने की कोई जानकारी नहीं थी। फिर भी कर लेंगे कोशिश, इस उम्मीद से मिलने चला गया। सिद्ध कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट में यह एक कंप्यूटर सेंटर था जिसमें बच्चों को कंप्यूटर सिखाने की क्लासेस चला करती थी। इसे राजीव सिंघल जी चलाते थे। राजीव सिंघल वैसे तो कानूनगो थे लेकिन पार्ट टाइम में वे कंप्यूटर सेंटर चलाते थे। मनोज शर्मा, संभवतः दोनों कार्यों में उनके सहायक थे। सेंटर पर मेरे अलावा और भी कई लोग पहले से बैठे थे। कई लेखकों, मॉडलों के अलावा एकमात्र सिंगर और म्यूजिशियन मुकेश राज़, साथ में उनके चचेरे भाई मनोज राज़ (तबलावादक़) जी भी मौजूद थे। यह बात आपसी बातचीत के दौरान मालूम हुई। खैर, लगभग सभी के बाद में, मेरा नंबर आया। मैंने पहले से लिखे कई गीत (कुछ तहत और कुछ अपने टूटे-फूटे तरन्नुम में) सुनाए। उन्होंने ये गीत मनोज शर्मा और मुकेश राज़ जी को भी ऑफ़िस में बुलवाकर सुनवाएं। सुनने के बाद, तीनों ने माना कि ये पहले वाले लेखकों से कुछ बेहतर हैं। लेकिन उन्हें गीत नहीं, ग़ज़ल चाहिए थीं, खासकर शराब पर, जोकि मेरे पास नहीं थीं। फिर भी उन्होंने निर्णय लिया कि मैं उनके अनुसार ग़ज़ल लिख सकता हूँ। इस हेतु राजीव सिंघल जी ने मुझसे पूछा, अमित जी आपको किसकी ग़ज़लें सुननी पसंद हैं, क्या आपके पास टेपरिकॉर्डर है? मेरी चुप्पी से वे समझ गये कि...। उन्होंने तुरंत अपने ऑफिस में रखा हुआ ल, एक सुन्दर काले रंग का टेपरिकॉर्डर (सेल और बिजली दोनों से चलने वाला) और जगजीत सिंह व पंकज उदास की ग़ज़लों की कुछ कैसेट्स दीं मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा- "अमित जी! पहले आप एक डेढ महीना, जमकर इन ग़ज़लों को सुनों। उसके बाद शराब पर कुछ ग़ज़लें लिखकर दिखाना। जल्दी कुछ नहीं है, आराम से सुनना और तसल्ली से लिखना। और जब मन करे तब ये टेपरिकॉर्डर व कैसेट्स लौटा देना।"
          बस फिर क्या था ग़ज़लें सुनने का ऐसा चस्का लगा कि जब भी वक़्त लगता टेपरिकॉर्डर में कैसेट चढ़ाते और तसल्ली से ग़ज़लें सुनी और गुनी जाती। "और आहिस्ता कीजे बातें, धड़कनें कोई सुन रहा होगा/कान रखते हैं ये दर ओ दीवार, राज़ की सारी बात सुन लेंगे।", "आप जिनके क़रीब होते हैं/वो बड़े खुशनसीब होते हैं।", आ जाये किसी दिन तू ऐसा भी नहीं लगता/लेकिन वो तेरा वादा झूठा भी नहीं लगता।", सबको मालूम है मैं शराबी नहीं, फिर भी कोई पिलाये तो मैं क्या करूँ/सिर्फ़ इक बार नज़रों से नज़रें मिले, और कसम टूट जाये तो मैं क्या करूँ।", तुम इतना जो मुस्करा रहे हो/क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो।", तुमको देखा तो ये ख़्याल आया/ज़िन्दगी धूप तुम घना साया।", दिल ही तो है न संग ओ खिस्त दर्दों से भर न आये क्यूँ/रोएंगे हम हज़ार बार, कोई हमें रुलाये क्यूँ।" ये तेरा घर ये मेरा घर किसी को देखना हो गर/तो पहले आके माँग ले तेरी नज़र मेरी नज़र।" आदि कई दर्जन ग़ज़लें और नज़्में महीने भर में ही इतनी बार सुनी गईं कि हर समय कोई न कोई ग़ज़ल या नज़्म ज़बान पर चढ़ी रहती। फिर एक दिन ऐसा भी आ गया जब अपनी मौलिक ग़ज़ल लिखने की कोशिश होने लगी। पहली ग़ज़ल 'जीना छोड़ूं न छोड़ूँ मैं पीना/ऐसा हूँ मैं मय का दीवाना।...' दो मार्च दो हजार तीन को लिखी गयी। उसके बाद तो कलम ऐसी चली कि महीने भर से भी कम समय में तीन चार ग़ज़लें और दस ग्यारह गीतनुमा नज़्में यानी कुल पंद्रह रचनाएँ लिखी गईं। सभी मय और मयकशी को लेकर लिखी गयी थीं। 
          उसके बाद मैं टेपरिकॉर्डर, कैसेट्स और तमाम रचनाओं के साथ, राजीव सिंघल जी से मिला। वहाँ मनोज शर्मा और मुकेश राज़ पहले से मौजूद थे। तीनों ने रचनाएँ सुनी और सराही। कुछ ग़ज़ल और गीत मुकेश राज़ जी ने हारमोनियम पर कंपोज भी करके देखें। बोले थोड़ी और मेहनत से ये सभी निखारे जा सकते हैं। लेकिन ग़ज़लों की एलबम बनाने के लिए अभी ग़ज़लें कम थीं। सो और ग़ज़लें लिखने और एलबम बनाये जाने के आश्वासन के साथ बात ठहर गई। इस संदर्भ में दो चार मीटिंग और हुई, लेकिन बात कुछ आगे बढ़ी नहीं। मगर इस दौरान मुकेश राज़ से अच्छी खासी दोस्ती गठ आयी थी। हमारी कुछ मुलाकातें अलग से भी हुईं। तब भी कोई रिजल्ट न आया। बाद में मुकेश राज़ बंबई चले गये और मैं भी अपनी दूसरी व्यस्तताओं में व्यस्त हो गया। राजीव सिंघल जी और मनोज शर्मा जी से तो कोई संपर्क नहीं रहा लेकिन मुकेश राज़ जी जब भी बंबई से मुजफ्फरनगर आते तो अक्सर हमारी दोस्ताना मुलाक़ात हो जाती। उस समय शुरू हुआ दोस्ती और मुलाकातों का सिलसिला आज तक बना हुआ है।
           बहरहाल, ग़ज़लों के अतिरिक्त गानों के विषय में भी प्रयास चलते रहे। जब भी कोई विज्ञापन दिखता तो उसके अनुसार कोशिशें की जाती। इस चक्कर में मुजफ्फरनगर से बाहर भी कई जगह कई बार जाना हुआ। इसी दौड़ धूप में अक्टूबर दो हजार तीन के आखिरी रविवार को जनपद मुजफ्फरनगर की साहित्यिक संस्था वाणी की मासिक गोष्ठी में जाने का सुअवसर मिला। गोष्ठी की सूचना नेमपाल प्रजापति ने दी थी। गोष्ठी आर्य समाज रोड स्थित सिद्धार्थ कालोनी में मिश्रा नर्सिंग होम यानी डॉ. बी के मिश्रा जी के आवासीय हॉल में हुई थी। उसमें पहली बार जनपद के उस्ताद शायर अब्दुल हक़ 'सहर' (जो कि ठीक मेरे बराबर वाली कुर्सी पर बैठे थे) को तरन्नुम से सुना। उनके तरन्नुम और ग़ज़ल दोनों ने प्रभावित किया। वाणी की गोष्ठियों में जाना शुरू हुआ तो हिंदी उर्दू की साहित्यिक संस्था समर्पण से भी जुड़ाव हो गया। इस दौरान, दो हजार दो की प्रथम तिमाही में जो क्लीनिक भरतीया कॉलोनी में शुरू किया था, वह दो हजार चार के आरम्भ में भरतीया कॉलोनी के सामने सड़क पार स्थित कमल नगर के तीस फूटे रोड पर शिफ्ट हो गया। यहाँ क्लीनिक वाले मकान में ही किराए पर कमरा भी लिया गया। अब तो जैसे लिखने पढ़ने और क्लीनिक पर बैठने के अलावा दूसरा कोई काम ही नहीं रह गया था। 
            दोनों संस्थाओं की मासिक गोष्ठियों में कई शायर और शायरा सहज ही सुनने को मिलने लगे। अब्दुल हक़ 'सहर' के अलावा, मौजूद्दीन बावरा उर्फ़ बावरा मुज़फ्फ़रनगरी, शबनम दुर्रानी, सलीम अहमद सलीम, अयाज़ अहमद तालिब, अलीम अख़्तर अलीम, नज़र मुज़फ्फ़रनगरी, मास्टर शौक़त फ़हमी, अब्दुल बिस्मिल दधेड़वी, डॉ. तनवीर गौहर, अरशद ज़िया के अलावा क़ाज़ी फ़रीद पाशा आज़ाद, डॉ. एस उवैस, रियाज़ अहमद ख़ान, तुलसी नीलकंठ, प्रकाश सूना, सुरेंद्र कुमार वत्स आदि ग़ज़लगो की साहित्यिक संगत प्राप्त होने लगी। ग़ज़लों की तरफ मेरा रुझान देखकर ही शायद मुझे मनु स्वामी जी ने निदा फ़ाज़ली का ग़ज़ल संग्रह 'सफ़र में धूप तो होगी' पढ़ने को दिया था। उसके बाद दुष्यंत कुमार के बारे में जानकारी मिली तो उनका एकमात्र ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' बमुश्किल ढूंढकर खरीदा। दोनों संग्रह बार-बार पढ़े, मन से पढ़े। इस तरह ग़ज़ल लिखने का सिलसिला चल निकला। डॉ. एस उवैस के पास इस्लाह हेतु अपनी ग़ज़लों की एक डायरी, कई माह तक छोड़े रखी। कई जरूरी सुझाव के बाद, उन्होंने डायरी ज्यों की त्यों लौटा दी। अब्दुल हक़ 'सहर' से तो कुछ दिन, शायरी सीखी भी और कुछ ग़ज़लों में इस्लाह भी ली। उनके संकेत पर इक्का-दुक्का तरही ग़ज़ल भी लिखी। (बानगी के तौर पर संग्रह में सबसे आखिरी ग़ज़ल बतौर तरही ग़ज़ल शामिल की गई है।) हिंदी उर्दू के मंचों से थोड़ा बहुत जुड़ाव बना तो कभी-कभी अशोक साहिल, खुर्शीद हैदर, डॉ. अश्वघोष, ओंकार गुलशन, सत्यपाल सत्यम, योगेश छिब्बर आनंद, विजेंद्र पाल शर्मा और सुनील उत्सव आदि के साथ भी, मंच साझा करने का अवसर मिल जाता। इस तरह, कवि सम्मेलनों और मुशायरों के मंचों के माध्यम से जनपद के साथ-साथ बाहर के कवियों और शायरों के साथ भी कुछ संगत हो जाती।
            कुल मिलाकर, दो हजार दो में पढ़ाई छूट जाने के बाद किये गये स्वतंत्र अध्ययन और लेखन का लाभ यह मिला कि जहां दो हजार दो और तीन में मौलिक छंद वाली पुस्तक 'आस विश्वास' के एक सौ इकतीस छंद लिखे, वहीं सैकड़ों गाने लिखे। इसी रचनात्मकता में जाने-अनजाने दो तीन गाने, ग़ज़ल की शक़्ल के भी लिखे गए। राजीव सिंघल जी के एक विज्ञापन ने तो ग़ज़लों से अटूट रिश्ता बना दिया। वाणी और समर्पण से जुड़कर ग़ज़लों में निखार तो आया ही, साथ ही ग़ज़ल लिखने को अप्रत्याशित गति भी मिली। इस तरह, दो हजार तीन, चार, पांच और छह में ग़ज़ल लिखने की ऐसी लत लगी कि इन वर्षों में अंधाधुंध ग़ज़लें लिखी। अंधाधुंध इसलिए कि न बहर का पता, न वज़्न का, कफ़िया, रदीफ़ की जानकारी भी, बस नाम की ही, फिर भी, किसी-किसी दिन तो दो-दो, तीन-तीन अथवा चार-चार तक ग़ज़लें लिखी गईं। उस समय, इन ग़ज़लों के प्रथम और दैनिक श्रोता मेरे पीसीओ वाले मित्र प्रमोद कुमार हुआ करते थे। यह सिलसिला उस समय रुका, जब दो हजार छह में, मैं प्राइवेट बेस से बारहवीं पास कर गया। प्रमोद जी, रेलवे में नौकरी लगने पर, सूरत, गुजरात में शिफ्ट हो गये। उसके बाद, किन्हीं कारणों से मुझे भी क्लीनिक कमल नगर से रामपुरी की शहाबुद्दीन रोड पर शिफ्ट करना पड़ा। क्लीनिक से कुछ दूर रामपुरी में ही तुलसी नीलकंठ का घर था। इस कारण तुलसी नीलकंठ से अब लगभग रोज मुलाकात होने लगी। दिन में क्लीनिक पर, तो शाम को अब्दुल हक़ 'सहर' की दुकान पर साथ-साथ जाकर चाय के साथ चर्चा किया करते। 
           दो हजार सात का अक्टूबर आते-आते इन मुलाकातों के परिणामस्वरूप, मेरी पहली काव्य पुस्तक 'आस विश्वास' प्रकाशित हुई। इसने साहित्य में मेरी उपस्थिति को स्थायी और महत्त्वपूर्ण बना दिया। इस दौरान, अयाज़ अहमद तालिब से भी अच्छी दोस्ती गठ आयी। अब मेरी, तुलसी और तालिब के साथ बैठकी होने लगी। कभी हम तीनों सहर' साहब की तो कभी मौअली की चाय की दुकान पर बैठते और साहित्य वार्ता करते। अपनी-अपनी रचनाएँ सुनते-सुनाते। यह सिलसिला करीब पांच बरस (दो हजार सात से दो हजार बारह तक) अनवरत चला। चार मार्च दो हजार बारह में तुलसी जी का देहावसान हो गया तो हमारी मुलाकातों में भी जैसे ब्रेक लग गया। छब्बीस जुलाई दो हजार तेरह को मुझे दिल्ली विश्विद्यालय में पीएच.डी. के लिए प्रवेश मिल गया। दो हजार चौदह के आरम्भ में, मैं दिल्ली आ गया। 2018 में पीएच.डी. जमा हो गई और साथ में पीएच.डी करने वाली दिल्ली निवासी गीता कृष्णांगी से शादी भी हो गई। उसके बाद तो जैसे दिल्ली का ही होकर रह गया। इस कारण आज अयाज़ अहमद तालिब के साथ भी कभी-कभी ही बैठना हो पाता है। लेकिन अयाज़ अहमद तालिब और अब्दुल हक़ 'सहर' अथवा दूसरे सभी संगी साथियों के साथ जुड़ाव में आज भी रत्ती भर फ़र्क नहीं आया है। आज भी जिस किसी से मिलना होता है तो वैसे ही रचना सुनना-सुनाना और सीखना-सिखाना होता है। इस प्रकार, दो हजार तीन से ग़ज़ल और शायरों से जो रिश्ता बना, वो आज तक बना हुआ है। सबके प्रति हृदय से आभार प्रकट करता हूँ। चूंकि ये सभी ग़ज़लें उन सभी की संगत में रहते हुए लिखी गईं हैं इसीलिए यह ग़ज़ल संग्रह उन सभी को ही समर्पित किया गया है। इस ग़ज़ल संग्रह के प्रकाशन के लिए मैं अपनी पत्नी डॉ. गीता कृष्णांगी का विशेष आभार व्यक्त करता हूँ कि उसी की ज़िद से यह ग़ज़ल संग्रह मंज़रे आम हो सका है।

अमित धर्मसिंह 
नांगलोई, दिल्ली
9310044324, 9358775029
 amitdharmsingh@gmail.com

27/10/2025













































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