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डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह बग़ैर मक़्ता का हुआ लोकार्पण

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डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह बग़ैर मक़्ता का हुआ लोकार्पण          दिल्ली। 20 दिसंबर, 2025 को आयोजित हुई नव दलित लेखक संघ की मासिक गोष्ठी में डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह बग़ैर मक़्ता का लोकार्पण उपस्थित साहित्यकारों द्वारा किया गया। गोष्ठी लोकार्पण और स्वतंत्र रचनापाठ पर आधारित रही जिसका संयोजन मामचंद सागर ने अपने दिल्ली स्थित राजोकरी आवास पर किया। गोष्ठी की अध्यक्षता नदलेस के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. अमित धर्मसिंह ने की और संचालन नदलेस के वर्तमान सचिव लोकेश कुमार ने किया। बंशीधर नाहरवाल, डॉ. पूरन सिंह, इंद्रजीत सुकुमार, मामचंद सागर, अमित धर्मसिंह और लोकेश कुमार आदि द्वारा बग़ैर मक़्ता का लोकार्पण किए जाने के उपरांत बग़ैर मक़्ता पर संक्षिप्त विचार रखे गए। सभी ने माना कि ग़ज़ल संग्रह बेहद खूबसूरत बन पड़ा है। ग़ज़ल संग्रह बग़ैर मक़्ता के शीर्षक आवरण और ग़ज़लों ने सभी को अप्रत्याशित रूप से आकर्षित किया। इस कारण सभी ने बग़ैर मक़्ता के शीर्षक, आवरण चित्र और इसमें दर्ज ग़ज़लों के विषय में जानने की उत्कंठा दिखाई। जिसका निवारण लेखक ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में देते...

डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह बग़ैर मक़्ता के साथ माता कुसुम देवी पिता धर्मसिंह और अन्य परिवार के सभी सदस्यगण

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  ग़ज़ल से पहला राब्ता, वास्ता और रास्ता          बचपन में मन सर्वप्रथम फिल्मी गीतों की तरफ आकर्षित होना शुरू हुआ था। यह आकर्षण, बड़ा होकर गाना लिखने वाला बनने की प्रबल इच्छा जागृत करता था। यह इच्छा, इतनी प्रबल थी कि कक्षा पांच तक आते-आते किसी-किसी गाने की नकल (पैरोडी) अथवा तुकबंदी जैसी पंक्तियां लिखने की कोशिश की जाने लगी थी। इस तरह, उन्नीस सौ पिचानवे में ही लिखने का उपक्रम शुरू हो गया था। आरम्भ में लिखने का कार्य होमवर्क की कॉपी में शुरू हुआ और बाद में दस रुपए वाले मोटे रफ रजिस्टर में। सन् उन्नीस सौ पिचानवे से निन्यानवे तक लिखने का उपक्रम बहुत धीमा रहा। यह किसी अवसर विशेष पर ही होता था। नया साल, रविदास जयंती, होली, दीवाली, शिवरात्रि, अम्बेडकर जयंती, चुनाव या कोई घटना विशेष जैसे अवसर पर ही कलम चल पाती थी। इससे अधिक सोचने व समझने की सामर्थ्य भी नहीं थी। अखबारों का कुछ रस्ता लगा तो रचनाएं, छपने के लिए भेजी जाने लगी। कभी-कभी कोई रचना छप जाती। बहुत खुशी मिलती और लिखने का उत्साह बढ़ जाता। इस तरह लिखने का सिलसिला चलता रहा। किशोर अवस्था, यानी सन् दो हजार तक आते-आ...